
यही लालू प्रसाद का नाम अगर लालू पांडेय, लालू मिश्रा, लालू झा, लालू बसु, लालू जोशी, लालू श्रीवास्तव, लालू सहाय, लालू दूबे, लालू चौबे, लालू त्रिपाठी, लालू तिवारी, लालू द्विवेदी, लालू त्रिवेदी, लालू चतुर्वेदी, लालू बनर्जी, लालू मुखर्जी, लालू चटर्जी, लालू भट्टाचार्य, लालू बंदोपाध्याय, लालू मुखोपाध्याय, लालू चट्टोपाध्याय, लालू महाजन, लालू जेटली, लालू सरदेसाई, लालू मंगेश्कर, लालू उपाध्याय, लालू वाजपेयी, लालू आडवाणी, लालू अवस्थी, लालू पाठक, लालू भार्गव, लालू दीक्षित, लालू वात्स्यायन, लालू त्यागी, लालू शुक्ला, लालू पंत, लालू भारद्वाज, लालू तेंदुलकर, लालू ओझा, लालू कुलश्रेष्ठ, लालू गडकरी, लालू भागवत या लालू पर्रिकर होता, तो मेरे जैसे व्यक्ति को लालू पर लगातार लेखनी चलाने की ज़रूरत नहीं पड़ती, पहले ही उन पर ग्रंथ के ग्रंथ लिखे जा चुके होते, और तब मैं अपनी यही ऊर्जा ईपीडब्ल्यू-मैनस्ट्रीम-वर्ल्ड फ़ोकस-कम्युनिकेटर-मैस मीडिया, आदि के लिए रिसर्च पेपर लिखने में लगा रहा होता।
पर, मेरी दिक्कत है कि मैं बेईमान नहीं हो सकता। किसी विषय पर जो सोचता हूँ, समझता हूँ, बूझता हूँ, परखता हूँ, वही तो लिखूँगा, वही तो बोलूंगा। मेयारे-ज़माना से अपना मेयार तय नहीं करता। हाँ, कल अगर वैचारिक यात्रा के दौरान कुछ और समझ में आएगा, तो वह लिखूँगा। गांधी के लगभग आधी सदी के सियासी सफ़र को देखें, तो उस यात्रा में आपको एक क़िस्म की विकासशीलता नज़र आएगी। इसलिए, मैं नाउम्मीदी में नहीं जीता।
उदय प्रकाश कितना सही कहते हैं:
आदमी मरने के बाद कुछ नहीं सोचता
आदमी मरने के बाद कुछ नहीं बोलता
कुछ नहीं सोचने और कुछ नहीं बोलने से
आदमी मर जाता है।
— लेख सोशल मीडिया से प्राप्त